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मगध विश्वविद्यालय घोटाला: 150-200 करोड़ के आरोपों के बाद प्रभारी कुलपति हटे, प्रो. दिलीप केसरी नए वीसी बने

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मगध विश्वविद्यालय में 150-200 करोड़ रुपये के कथित घोटाले और भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद राज्यपाल ने प्रभारी कुलपति को हटा दिया है। प्रो. दिलीप केसरी नए प्रभारी कुलपति बनाए गए हैं।

पटना/आलम की खबर:Patna से जुड़ा मगध विश्वविद्यालय एक बड़े प्रशासनिक और वित्तीय विवाद के केंद्र में आ गया है। विश्वविद्यालय में कथित रूप से 150 से 200 करोड़ रुपये के वित्तीय अनियमितताओं, अवैध नियुक्तियों और कोष के गलत उपयोग के आरोप सामने आने के बाद राज्यपाल स्तर पर बड़ी कार्रवाई की गई है। इस कार्रवाई के तहत कार्यवाहक कुलपति प्रो. शशि प्रताप शाही को पद से हटा दिया गया है और उनकी जगह विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक प्रो. दिलीप केसरी को नया प्रभारी कुलपति नियुक्त किया गया है।

यह पूरा मामला सामने आने के बाद बिहार के शैक्षणिक जगत में हलचल तेज हो गई है और विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कई स्तरों पर जांच की मांग उठने के बाद अब यह मामला प्रशासनिक कार्रवाई से आगे बढ़कर राजनीतिक और कानूनी चर्चा का विषय बन चुका है।

शिकायतों से शुरू हुआ विवाद, फिर बढ़ा मामला

इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब पूर्व सांसद एवं भाजपा नेता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मगध विश्वविद्यालय में बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी का आरोप लगाया। आरोपों में कहा गया कि सेवानिवृत्ति के बाद भी प्रभारी कुलपति के रूप में कार्यरत प्रो. शशि प्रताप शाही के कार्यकाल में विश्वविद्यालय के कोष से भारी राशि की अनियमित निकासी की गई।

पत्र में यह भी दावा किया गया कि कई नियुक्तियां नियमों को दरकिनार कर की गईं और प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता की कमी रही। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि विश्वविद्यालय के कुछ फैसलों में उच्च स्तर पर प्रभावशाली लोगों की भूमिका भी संदिग्ध रही है।

150–200 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का आरोप

आरोपों के अनुसार विश्वविद्यालय में वित्तीय लेनदेन में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं, जिनकी अनुमानित राशि 150 से 200 करोड़ रुपये तक बताई जा रही है। इसमें अवैध निकासी, बिना प्रक्रिया के भुगतान, और नियुक्तियों में गड़बड़ी जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।

हालांकि इन सभी आरोपों की अभी स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शिकायतों और दस्तावेजों के आधार पर मामला काफी गंभीर माना जा रहा है। यही कारण है कि प्रशासनिक स्तर पर तुरंत कार्रवाई की गई।

राजभवन की कार्रवाई और नई नियुक्ति

मामला तूल पकड़ने के बाद राज्यपाल सचिवालय ने हस्तक्षेप करते हुए बड़ा निर्णय लिया। प्रो. शशि प्रताप शाही को प्रभारी कुलपति पद से हटाकर प्रो. दिलीप केसरी को नया प्रभारी कुलपति नियुक्त किया गया है।

सूत्रों के अनुसार नई नियुक्ति के साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि विश्वविद्यालय में अब सभी महत्वपूर्ण निर्णय राजभवन की अनुमति के बाद ही लागू किए जाएंगे। इसका उद्देश्य प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय नियंत्रण को मजबूत करना बताया जा रहा है।

कानूनी प्रक्रिया और जनहित याचिका

इस पूरे मामले को लेकर पटना उच्च न्यायालय में जनहित याचिका भी दायर की गई है, जिसमें विश्वविद्यालय में कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि मामले की जांच किसी निष्पक्ष एजेंसी से कराई जानी चाहिए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

इसके अलावा कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षकों ने भी राज्यपाल सचिवालय में शिकायत दर्ज कराते हुए पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।

विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी

इस विवाद पर विश्वविद्यालय प्रशासन या पूर्व प्रभारी कुलपति की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि शैक्षणिक हलकों में इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज है और छात्र संगठनों में भी असंतोष देखा जा रहा है।

कई छात्र संगठनों ने मांग की है कि विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली की पूरी तरह से जांच हो और यदि कोई दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

शैक्षणिक और राजनीतिक हलचल

इस मामले ने बिहार के शिक्षा क्षेत्र में गंभीर बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों के साथ-साथ शिक्षक संगठन भी विश्वविद्यालय प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं। छात्रों का कहना है कि शिक्षा संस्थानों को राजनीति और भ्रष्टाचार से दूर रखा जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो यह मामला राज्य के उच्च शिक्षा ढांचे पर बड़ा असर डाल सकता है और कई अन्य संस्थानों की जांच का रास्ता भी खुल सकता है।

आगे की संभावित कार्रवाई

अब सभी की नजर जांच एजेंसियों की भूमिका पर टिकी है। यदि औपचारिक जांच शुरू होती है, तो विश्वविद्यालय के कई पूर्व और वर्तमान अधिकारियों पर कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

प्रशासनिक स्तर पर भी संकेत दिए गए हैं कि किसी भी प्रकार की अनियमितता पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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